श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 10: विभीषण का रावण के महल में जाना, उसे अपशकुनों का भय दिखाकर सीता को लौटा देने के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  6.10.15 
सस्फुलिङ्ग: सधूमार्चि: सधूमकलुषोदय:।
मन्त्रसंधुक्षितोऽप्यग्निर्न सम्यगभिवर्धते॥ १५॥
 
 
अनुवाद
मन्त्रों के उच्चारण से अग्नि को भली-भाँति प्रज्वलित करने पर भी अग्नि ठीक से नहीं जलती। उसमें से चिंगारियाँ निकलने लगती हैं। उसकी लपटों के साथ धुआँ उठने लगता है और जब मंथन के समय अग्नि प्रकट होती है, तब भी वह धुएँ से मलिन रहती है॥15॥
 
‘Even after properly lighting the fire with the chanting of mantras, the fire is not burning properly. Sparks start coming out of it. Smoke starts rising along with its flames and when the fire appears during the churning, even then it remains dirty with smoke.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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