श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 10: विभीषण का रावण के महल में जाना, उसे अपशकुनों का भय दिखाकर सीता को लौटा देने के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  6.10.12-13 
स रावणं महात्मानं विजने मन्त्रिसंनिधौ।
उवाच हितमत्यर्थं वचनं हेतुनिश्चितम्॥ १२॥
प्रसाद्य भ्रातरं ज्येष्ठं सान्त्वेनोपस्थितक्रम:।
देशकालार्थसंवादि दृष्टलोकपरावर:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
विभीषण संसार की अच्छी-बुरी बातों को भली-भाँति जानते थे। उन्होंने अभिवादन आदि समस्त आचार-विचारों का पालन करके अपने बड़े भाई महामना रावण को सान्त्वना देकर प्रसन्न किया तथा मन्त्रियों के सामने एकान्त में देश, काल और प्रयोजन के अनुसार तर्क सहित निश्चित एवं अत्यन्त हितकारी बातें कहीं-॥12-13॥
 
Vibhishan knew very well the good and bad things of the world. He pleased his elder brother Mahamana Ravana by consoling him by following all the rules of conduct like greetings etc. and in private in front of the ministers, he told him something definite and very beneficial with logic, according to the place, time and purpose -॥ 12-13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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