श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 68: हनुमान जी का सीता के संदेह और अपने द्वारा उनके निवारण का वृत्तान्त बताना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.68.1 
अथाहमुत्तरं देव्या पुनरुक्त: ससम्भ्रमम्।
तव स्नेहान्नरव्याघ्र सौहार्दादनुमान्य च॥ १॥
 
 
अनुवाद
पुरुषसिंह रघुनन्दन! आपके प्रति स्नेह और सौहार्द के कारण देवी सीता ने मेरा सत्कार करके शीघ्रता से प्रस्थान करते हुए मुझसे पुनः यह अच्छी बात कही -॥1॥
 
Purushasingh Raghunandan! Due to her affection and cordiality towards you, Goddess Sita, in haste to leave after honouring me, once again said this good thing to me -॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)