श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 67: हनुमान जी का भगवान् श्रीराम को सीता का संदेश सुनाना  »  श्लोक 32-35
 
 
श्लोक  5.67.32-35 
गमने च कृतोत्साहमवेक्ष्य वरवर्णिनी॥ ३२॥
विवर्धमानं च हि मामुवाच जनकात्मजा।
अश्रुपूर्णमुखी दीना बाष्पगद‍्गदभाषिणी॥ ३३॥
ममोत्पतनसम्भ्रान्ता शोकवेगसमाहता।
मामुवाच तत: सीता सभाग्योऽसि महाकपे॥ ३४॥
यद् द्रक्ष्यसि महाबाहुं रामं कमललोचनम्।
लक्ष्मणं च महाबाहुं देवरं मे यशस्विनम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
मुझे लौटने के लिए उत्साहपूर्वक शरीर फैलाते देख सुन्दर जनकनन्दिनी सीता अत्यन्त दुःखी हो गईं। उनके मुख से आँसुओं की धारा बहने लगी। मेरे कूदने की तैयारी से वे घबरा गईं और शोक के वेग से आहत हो गईं। उस समय उनका स्वर अश्रुपूर्ण हो गया था। वे मुझसे कहने लगीं - 'महाकपे! तुम बड़े भाग्यशाली हो, जो अपने नेत्रों से मेरे प्रिय कमलनयन श्री राम और मेरे यशस्वी देवर महाबाहु लक्ष्मण को देखोगे।'॥32-35॥
 
‘Seeing me stretching my body in excitement to return, the beautiful Janakanandini Sita became very sad. A stream of tears started flowing from her face. She became nervous due to my preparations to jump and was hurt by the force of grief. At that time her voice had become tearful. She started saying to me – ‘Mahakpe! You are very fortunate that you will see with your own eyes my beloved lotus-eyed Shri Ram and my famous brother-in-law, the mighty-armed Lakshman.’॥ 32-35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)