श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 67: हनुमान जी का भगवान् श्रीराम को सीता का संदेश सुनाना  »  श्लोक 31-32h
 
 
श्लोक  5.67.31-32h 
प्रतिगृह्य मणिं दोर्भ्यां तव हेतो रघुप्रिय॥ ३१॥
शिरसा सम्प्रणम्यैनामहमागमने त्वरे।
 
 
अनुवाद
हे रघुवंशियों के प्रिय श्री राम! आपके लिए यह मणि दोनों हाथों में लेकर मैंने सिर झुकाकर सीता देवी को प्रणाम किया और यहाँ आने के लिए अधीर हो गया।
 
O beloved of the Raghuvanshis, Shri Ram! Holding this gem in both my hands for you, I bowed my head and paid my obeisance to Sita Devi and became impatient to come here.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)