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श्लोक 5.66.8  |
किमाह सीता वैदेही ब्रूहि सौम्य पुन: पुन:।
परासुमिव तोयेन सिञ्चन्ती वाक्यवारिणा॥ ८॥ |
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| अनुवाद |
| हे पवनपुत्र! जैसे मूर्छित मनुष्य को होश में लाने के लिए उस पर जल छिड़का जाता है, वैसे ही विदेहनन्दिनी सीता ने मुझ मूर्छित व्यक्ति पर अपने वचनों का शीतल जल छिड़कते हुए क्या-क्या कहा? यह बात मुझे बार-बार बताओ॥8॥ |
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| Gentle son of the wind! Just as water is sprinkled on an unconscious person to revive him, what all did Videhanandini Sita say to me, who was unconscious, while sprinkling the cool water of her words? Tell me this again and again.'॥ 8॥ |
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