श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 66: चूडामणि को देखकर और सीता का समाचार पाकर श्रीराम का उनके लिए विलाप  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.66.3 
यथैव धेनु: स्रवति स्नेहाद् वत्सस्य वत्सला।
तथा ममापि हृदयं मणिश्रेष्ठस्य दर्शनात्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
मित्र! जिस प्रकार गाय के थन अपने बछड़े के प्रेम के कारण दूध छोड़ने लगते हैं, उसी प्रकार आज इस अनमोल रत्न को देखकर मेरा हृदय द्रवित हो रहा है।
 
Friend! Just as a cow's udders start gushing out milk due to the love for its calf, in the same way my heart is melting today on seeing this precious gem.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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