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श्लोक 5.66.3  |
यथैव धेनु: स्रवति स्नेहाद् वत्सस्य वत्सला।
तथा ममापि हृदयं मणिश्रेष्ठस्य दर्शनात्॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| मित्र! जिस प्रकार गाय के थन अपने बछड़े के प्रेम के कारण दूध छोड़ने लगते हैं, उसी प्रकार आज इस अनमोल रत्न को देखकर मेरा हृदय द्रवित हो रहा है। |
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| Friend! Just as a cow's udders start gushing out milk due to the love for its calf, in the same way my heart is melting today on seeing this precious gem. |
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