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ramayan 5.65.16-17: ककुत्स्थकुलभूषण! उनका मन सदैव आपमें ही लगा रहता है। हे निष्पाप पुरुष! मैंने बड़े प्रयत्न से किसी प्रकार रानी सीता को ढूंढ़ निकाला और इक्ष्वाकु वंश की महिमा सुनाकर उनके हृदय में अपने प्रति श्रद्धा उत्पन्न कर दी। तत्पश्चात् देवी से वार्तालाप करके मैंने उन्हें इस स्थान के विषय में सब कुछ बताया।॥16-17॥   |   ramayan सर्ग 5.65: हनुमान जी का श्रीराम को सीता का समाचार सुनाना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 65: हनुमान जी का श्रीराम को सीता का समाचार सुनाना  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  5.65.16-17 
देवी कथंचित् काकुत्स्थ त्वन्मना मार्गिता मया।
इक्ष्वाकुवंशविख्यातिं शनै: कीर्तयतानघ॥ १६॥
सा मया नरशार्दूल शनैर्विश्वासिता तदा।
तत: सम्भाषिता देवी सर्वमर्थं च दर्शिता॥ १७॥
 
 
अनुवाद
ककुत्स्थकुलभूषण! उनका मन सदैव आपमें ही लगा रहता है। हे निष्पाप पुरुष! मैंने बड़े प्रयत्न से किसी प्रकार रानी सीता को ढूंढ़ निकाला और इक्ष्वाकु वंश की महिमा सुनाकर उनके हृदय में अपने प्रति श्रद्धा उत्पन्न कर दी। तत्पश्चात् देवी से वार्तालाप करके मैंने उन्हें इस स्थान के विषय में सब कुछ बताया।॥16-17॥
 
Kakutsthakulbhushan! Her mind is always focused on you. O sinless man! I somehow managed to find Queen Sita with great effort and by narrating the glory of the Ikshwaku dynasty, I somehow created faith in her heart for me. After that, after talking to the Goddess, I told her everything about this place.॥ 16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)