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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 64: दधिमुख से सुग्रीव का संदेश सुनकर अङ्गद-हनुमान् आदि वानरों का किष्किन्धा में पहुँचना और हनमान जी का श्रीराम को प्रणाम करके सीता देवी के दर्शन का समाचार बताना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  5.64.44 
निश्चितार्थं ततस्तस्मिन् सुग्रीवं पवनात्मजे।
लक्ष्मण: प्रीतिमान् प्रीतं बहुमानादवैक्षत॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
सुग्रीव ने पहले ही निश्चय कर लिया था कि यह कार्य पवनपुत्र हनुमान के द्वारा ही सम्पन्न होगा। अतः प्रसन्नचित्त लक्ष्मण ने प्रेममय सुग्रीव की ओर बड़े आदर से देखा।
 
Sugreeva had already decided that the task was accomplished through Hanuman, the son of the wind. Therefore, a pleased Lakshmana looked at the loving Sugreeva with great respect. 44.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)