श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 64: दधिमुख से सुग्रीव का संदेश सुनकर अङ्गद-हनुमान् आदि वानरों का किष्किन्धा में पहुँचना और हनमान जी का श्रीराम को प्रणाम करके सीता देवी के दर्शन का समाचार बताना  »  श्लोक 35-37h
 
 
श्लोक  5.64.35-37h 
मा भूश्चिन्तासमायुक्त: सम्प्रत्यमितविक्रम॥ ३५॥
यदा हि दर्पितोदग्रा: संगता: काननौकस:।
नैषामकृतकार्याणामीदृश: स्यादुपक्रम:॥ ३६॥
वनभङ्गेन जानामि मधूनां भक्षणेन च।
 
 
अनुवाद
हे महापराक्रमी श्री राम! अब आपको चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। ये वनवासी वानर जो इतने अहंकार से भरे हुए यहाँ आ रहे हैं, उनका यहाँ आना बिना अपना कार्य सिद्ध हुए संभव नहीं था। उनका मधुपान करना और वन को नष्ट करना भी मुझे ऐसा ही प्रतीत होता है।॥35-36 1/2॥
 
‘Immensely valiant Shri Ram! Now you need not worry. These forest dwelling monkeys who are coming here full of so much arrogance, it was not possible for them to come here without their work being accomplished. Their drinking of honey and destroying the forest also seems to me to be the same.’॥ 35-36 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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