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ramayan 5.64.17: ‘यद्यपि मैं युवराज हूँ, फिर भी मैं तुम्हें आज्ञा नहीं दे सकता। तुमने बहुत बड़ा कार्य किया है, इसलिए तुम पर बलपूर्वक शासन करना उचित नहीं है।’॥17॥   |   ramayan सर्ग 5.64: दधिमुख से सुग्रीव का संदेश सुनकर अङ्गद-हनुमान् आदि वानरों का किष्किन्धा में पहुँचना और हनमान जी का श्रीराम को प्रणाम करके सीता देवी के दर्शन का समाचार बताना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 64: दधिमुख से सुग्रीव का संदेश सुनकर अङ्गद-हनुमान् आदि वानरों का किष्किन्धा में पहुँचना और हनमान जी का श्रीराम को प्रणाम करके सीता देवी के दर्शन का समाचार बताना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.64.17 
नाज्ञापयितुमीशोऽहं युवराजोऽस्मि यद्यपि।
अयुक्तं कृतकर्माणो यूयं धर्षयितुं बलात्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
‘यद्यपि मैं युवराज हूँ, फिर भी मैं तुम्हें आज्ञा नहीं दे सकता। तुमने बहुत बड़ा कार्य किया है, इसलिए तुम पर बलपूर्वक शासन करना उचित नहीं है।’॥17॥
 
‘Even though I am the crown prince, I cannot command you. You have accomplished a great task, so it is not right to rule you with force.’॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)