श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 63: दधिमुख से मधुवन के विध्वंस का समाचार सुनकर सुग्रीव का हनुमान् आदि वानरों की सफलता के विषय में अनुमान  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  5.63.30-31 
प्रीतोऽस्मि सोऽहं यद्भुक्तं वनं तै: कृतकर्मभि:॥ ३०॥
धर्षितं मर्षणीयं च चेष्टितं कृतकर्मणाम्।
गच्छ शीघ्रं मधुवनं संरक्षस्व त्वमेव हि।
शीघ्रं प्रेषय सर्वांस्तान् हनूमत्प्रमुखान् कपीन्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
'चाचा! मेरे मधुवन में वानरों ने अपना कार्य पूरा करके जो आनंद उठाया है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ; इसलिए आप उन वानरों की धृष्टता और अहंकारपूर्ण हरकतों को भी क्षमा कर दीजिए जो अपना कार्य पूरा करके लौटे हैं। अब आप शीघ्र जाकर उस मधुवन की रक्षा कीजिए। साथ ही हनुमान सहित सभी वानरों को शीघ्र यहाँ भेज दीजिए।'
 
‘Uncle! I am very pleased with the enjoyment that the monkeys have had in my Madhuvan after completing their work; therefore, you should also forgive the impudence and arrogant actions of those monkeys who have returned after completing their work. Now go quickly and you alone protect that Madhuvan. Also send all the monkeys including Hanuman here quickly.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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