श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 63: दधिमुख से मधुवन के विध्वंस का समाचार सुनकर सुग्रीव का हनुमान् आदि वानरों की सफलता के विषय में अनुमान  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  5.63.27 
न चाप्यदृष्ट्वा वैदेहीं विश्रुता: पुरुषर्षभ।
वनं दत्तवरं दिव्यं धर्षयेयुर्वनौकस:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
हे महात्मन! विदेहनन्दिनी के दर्शन किए बिना वे प्रसिद्ध वानर उस दिव्य वन को कभी नष्ट नहीं कर सकते थे, जिसे मेरे पूर्वजों ने देवताओं से वरदान स्वरूप प्राप्त किया था।॥27॥
 
O great man! Without seeing Videhanandini, those famous monkeys could never have destroyed that divine forest, which my ancestors had received as a boon from the gods.'॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)