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श्लोक 5.61.17  |
परस्परं केचिदुपाश्रयन्ति
परस्परं केचिदतिब्रुवन्ति।
द्रुमाद् द्रुमं केचिदभिद्रवन्ति
क्षितौ नगाग्रान्निपतन्ति केचित्॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| कुछ लोग एक-दूसरे से मिलने जाते, कुछ आपस में बहस करते, कुछ एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर दौड़ते और कुछ पेड़ों की शाखाओं से ज़मीन पर कूदते। |
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| Some would go and meet each other, some would argue amongst themselves, some would run from one tree to another and some would jump from the branches of the trees to the ground. |
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