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ramayan 5.58.162-164h: उस अद्भुत वाणी को सुनकर मेरे मन में यह विचार उत्पन्न हुआ - 'शुभ शकुनों से भी ऐसा प्रतीत होता है कि जानकीजी नहीं जली हैं; क्योंकि मेरी पूँछ में आग लग जाने पर भी अग्निदेव मुझे नहीं जला रहे हैं। मेरा हृदय महान आनन्द से भर गया है और अद्भुत सुगन्ध से युक्त मंद वायु बह रही है।'॥162-163 1/2॥   |   ramayan सर्ग 5.58: जाम्बवान् के पूछने पर हनुमान जी का अपनी लङ्का यात्रा का सारा वृत्तान्त सुनाना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 58: जाम्बवान् के पूछने पर हनुमान जी का अपनी लङ्का यात्रा का सारा वृत्तान्त सुनाना  »  श्लोक 162-164h
 
 
श्लोक  5.58.162-164h 
ततो मे बुद्धिरुत्पन्ना श्रुत्वा तामद्भुतां गिरम्॥ १६२॥
अदग्धा जानकीत्येव निमित्तैश्चोपलक्षितम्।
दीप्यमाने तु लाङ्गूले न मां दहति पावक:॥ १६३॥
हृदयं च प्रहृष्टं मे वाता: सुरभिगन्धिन:।
 
 
अनुवाद
उस अद्भुत वाणी को सुनकर मेरे मन में यह विचार उत्पन्न हुआ - 'शुभ शकुनों से भी ऐसा प्रतीत होता है कि जानकीजी नहीं जली हैं; क्योंकि मेरी पूँछ में आग लग जाने पर भी अग्निदेव मुझे नहीं जला रहे हैं। मेरा हृदय महान आनन्द से भर गया है और अद्भुत सुगन्ध से युक्त मंद वायु बह रही है।'॥162-163 1/2॥
 
Hearing that wonderful voice, this thought arose in my mind - 'Even from the good omens, it appears that Janakiji has not been burnt; because even though my tail has caught fire, the fire god is not burning me. My heart is filled with great joy and a gentle breeze filled with wonderful fragrance is blowing.'॥ 162-163 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)