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ramayan 5.57.8: वे कभी बादलों में प्रवेश करते, कभी बादलों से बाहर निकल आते। ऐसा बार-बार करते हुए हनुमानजी चन्द्रमा के समान प्रकट होते, छिपते और चमकते थे॥8॥   |   ramayan सर्ग 5.57: हनुमान जी का समद्र को लाँघकर जाम्बवान् और अङ्गद आदि सुहृदों से मिलना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 57: हनुमान जी का समद्र को लाँघकर जाम्बवान् और अङ्गद आदि सुहृदों से मिलना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  5.57.8 
प्रविशन्नभ्रजालानि निष्क्रमंश्च पुन: पुन:।
प्रकाशश्चाप्रकाशश्च चन्द्रमा इव दृश्यते॥ ८॥
 
 
अनुवाद
वे कभी बादलों में प्रवेश करते, कभी बादलों से बाहर निकल आते। ऐसा बार-बार करते हुए हनुमानजी चन्द्रमा के समान प्रकट होते, छिपते और चमकते थे॥8॥
 
He would sometimes enter and sometimes come out of those clouds. While doing this repeatedly, Hanumanji was appearing like the moon, hiding and shining. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)