श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 57: हनुमान जी का समद्र को लाँघकर जाम्बवान् और अङ्गद आदि सुहृदों से मिलना  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  5.57.53 
हनूमता कीर्तिमता यशस्विना
तथाङ्गदेनाङ्गदनद्धबाहुना।
मुदा तदाध्यासितमुन्नतं मह-
न्महीधराग्रं ज्वलितं श्रियाभवत्॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
वह ऊँचा और महान पर्वत शिखर, तेजस्वी और तेजस्वी हनुमान जी तथा भुजाओं में भुजबंध लिए हुए सुखपूर्वक बैठे हुए अंगद के कारण दिव्य प्रकाश से प्रकाशित हो रहा था॥53॥
 
That high and great mountain peak became illuminated with divine light due to the illustrious and illustrious Hanuman ji and Angad sitting happily with the Bhujbandh in his arms. 53॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तपञ्चाश: सर्ग:॥ ५७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५७॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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