श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 57: हनुमान जी का समद्र को लाँघकर जाम्बवान् और अङ्गद आदि सुहृदों से मिलना  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  5.57.52 
तस्थौ तत्राङ्गद: श्रीमान् वानरैर्बहुभिर्वृत:।
उपास्यमानो विबुधैर्दिवि देवपतिर्यथा॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
जैसे देवताओं से सेवित होकर भगवान इन्द्र स्वर्ग में विराजमान रहते हैं, वैसे ही श्रीमान् अंगद भी वहाँ मध्य में बहुत से वानरों से घिरे हुए विराजमान थे ॥ 52॥
 
Just as Lord Indra sits in heaven, served by the gods, similarly Shriman Angada sat there in the middle, surrounded by a large number of monkeys. ॥ 52॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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