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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 57: हनुमान जी का समद्र को लाँघकर जाम्बवान् और अङ्गद आदि सुहृदों से मिलना  »  श्लोक 11-13h
 
 
श्लोक  5.57.11-13h 
नदन् नादेन महता मेघस्वनमहास्वन:।
प्रवरान् राक्षसान् हत्वा नाम विश्राव्य चात्मन:॥ ११॥
आकुलां नगरीं कृत्वा व्यथयित्वा च रावणम्।
अर्दयित्वा महावीरान् वैदेहीमभिवाद्य च॥ १२॥
आजगाम महातेजा: पुनर्मध्येन सागरम्।
 
 
अनुवाद
इस प्रकार महाबली हनुमान अपनी प्रचण्ड गर्जना से बादलों की गर्जना को भी पार करते हुए आगे बढ़ रहे थे। उन्होंने बड़े-बड़े राक्षसों का वध करके अपना नाम प्रसिद्ध किया था। बड़े-बड़े योद्धाओं को रौंदकर उन्होंने लंका नगरी को अस्त-व्यस्त कर दिया था और रावण को व्यथित कर दिया था। तत्पश्चात, वे विदेह पुत्री सीता को प्रणाम करके चले और पुनः तीव्र गति से समुद्र के मध्य पहुँच गए।
 
In this way, Hanuman, the great and powerful, was moving ahead, overcoming even the deep roar of the clouds with his great roar. He had made his name famous by killing the major demons. By trampling the great warriors, he had disturbed the city of Lanka and distressed Ravana. After that, he left after saluting Videha's daughter Sita and again reached the middle of the ocean at a fast speed.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)