श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 57: हनुमान जी का समद्र को लाँघकर जाम्बवान् और अङ्गद आदि सुहृदों से मिलना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  5.57.10 
तार्क्ष्ॺायमाणो गगने स बभौ वायुनन्दन:।
दारयन् मेघवृन्दानि निष्पतंश्च पुन: पुन:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
बार-बार बादलों को चीरकर उनके बीच से गुजरने के कारण पवनपुत्र हनुमान आकाश में गरुड़ के समान दिखाई देते थे ॥10॥
 
Because of repeatedly tearing apart the clouds and passing through them, Hanuman, the son of the wind, appeared like an eagle in the sky. ॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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