vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
»
काण्ड 5: सुन्दर काण्ड
»
सर्ग 56: हनुमान जी का पुनः सीताजी से मिलकर लौटना और समुद्र को लाँघना
»
श्लोक 46
श्लोक
5.56.46
त्रस्तव्याविद्धवसना व्याकुलीकृतभूषणा:।
विद्याधर्य: समुत्पेतु: सहसा धरणीधरात्॥ ४६॥
अनुवाद
वे विद्याधरी जिनके वस्त्र भय के कारण ढीले हो गए थे और आभूषण फट गए थे, वे अचानक उस पर्वत से ऊपर की ओर उड़ चले।
Those Vidyadharis whose clothes had become loose and ornaments were torn apart due to fear, suddenly flew upwards from that mountain.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×