श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 56: हनुमान जी का पुनः सीताजी से मिलकर लौटना और समुद्र को लाँघना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  5.56.44 
तस्योरुवेगोन्मथिता: पादपा: पुष्पशालिन:।
निपेतुर्भूतले भग्ना: शक्रायुधहता इव॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
उसके महान वेग से काँपते हुए फूलों से लदे हुए बहुत से वृक्ष पृथ्वी पर गिर पड़े, मानो उन पर वज्र गिरा हो ॥44॥
 
Trembling with his great speed, many trees laden with flowers fell to the earth as if they had been struck by thunderbolt. ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)