श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 56: हनुमान जी का पुनः सीताजी से मिलकर लौटना और समुद्र को लाँघना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.56.33 
जृम्भमाणमिवाकाशे शिखरैरभ्रमालिभि:।
कूटैश्च बहुधा कीर्णं शोभितं बहुकन्दरै:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
ऐसा लग रहा था जैसे वह बादलों से सजी चोटियों के साथ आकाश में फैला हुआ हो। वह अनगिनत चोटियों से ढका हुआ था और अनगिनत गुफाओं से सुसज्जित था।
 
It seemed to be stretching itself in the sky with its peaks adorned with clouds. It was covered with numerous peaks and decorated with many caves.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)