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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 54: लङ्कापुरी का दहन और राक्षसों का विलाप  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.54.6 
तत: प्रदीप्तलाङ्गूल: सविद्युदिव तोयद:।
भवनाग्रेषु लङ्काया विचचार महाकपि:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
ऐसा विचार करके, वानरों में श्रेष्ठ हनुमान अपनी जलती हुई पूँछ के कारण बिजली से चमकते हुए बादल के समान शोभा पाते हुए लंका के महलों में घूमने लगे।
 
Thinking thus, the best of the apes, Hanuman, looking like a cloud with lightning due to his burning tail, started roaming around the palaces of Lanka.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)