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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 54: लङ्कापुरी का दहन और राक्षसों का विलाप  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  5.54.39 
ततस्तु लङ्का सहसा प्रदग्धा
सराक्षसा साश्वरथा सनागा।
सपक्षिसङ्घा समृगा सवृक्षा
रुरोद दीना तुमुलं सशब्दम्॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार समस्त लंका, घोड़े, हाथी, रथ, पशु, पक्षी, वृक्ष और अनेक राक्षस, सब सहसा जलकर राख हो गए। वहाँ के निवासी दयनीय होकर फूट-फूट कर रोने और चिल्लाने लगे।
 
In this manner, the whole of Lanka was suddenly burnt down along with horses, elephants, chariots, animals, birds, trees and many demons. The residents there started crying bitterly and making loud noises in a pitiable state.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)