श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 52: विभीषण का दूत के वध को अनुचित बताकर उसे दूसरा कोई दण्ड देने के लिये कहना तथा रावण का उनके अनरोध को स्वीकार कर लेना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.52.3 
तं रक्षोऽधिपतिं क्रुद्धं तच्च कार्यमुपस्थितम्।
विदित्वा चिन्तयामास कार्यं कार्यविधौ स्थित:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
एक ओर राक्षसराज रावण क्रोध में भरा हुआ था, और दूसरी ओर दूत को मारने के कार्य में लगा हुआ था। यह सब जानते हुए भी उचित कार्य करने में तत्पर विभीषण ने उचित कर्तव्य का निश्चय किया॥3॥
 
On one hand, the demon king Ravana was filled with anger, and on the other hand, he was busy with the task of killing the messenger. Knowing all this, Vibhishana, who was busy in carrying out the appropriate task, decided on the appropriate duty.॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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