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श्लोक 5.52.28  |
निशाचराणामधिपोऽनुजस्य
विभीषणस्योत्तमवाक्यमिष्टम्।
जग्राह बुद्धॺा सुरलोकशत्रु-
र्महाबलो राक्षसराजमुख्य:॥ २८॥ |
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| अनुवाद |
| अपने छोटे भाई विभीषण के ये सुन्दर एवं प्रिय वचन सुनकर रात्रि के स्वामी और देवताओं के शत्रु महाबली राक्षसराज रावण ने बुद्धिपूर्वक विचार करके उसे स्वीकार कर लिया॥28॥ |
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| Hearing these beautiful and beloved words of his younger brother Vibhishana, the mighty demon king Ravana, the lord of the nights and the enemy of the world of gods, after thinking wisely, accepted it. 28॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे द्विपञ्चाश: सर्ग:॥ ५२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५२॥ |
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