श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 50: रावण का प्रहस्त के द्वारा हनुमान जी से लङ्का में आने का कारण पुछवाना और हनुमान् का अपने को श्रीराम का दूत बताना  »  श्लोक 14-16h
 
 
श्लोक  5.50.14-16h 
जातिरेव मम त्वेषा वानरोऽहमिहागत:।
दर्शने राक्षसेन्द्रस्य तदिदं दुर्लभं मया॥ १४॥
वनं राक्षसराजस्य दर्शनार्थं विनाशितम्।
ततस्ते राक्षसा: प्राप्ता बलिनो युद्धकाङ्क्षिण:॥ १५॥
रक्षणार्थं च देहस्य प्रतियुद्धा मया रणे।
 
 
अनुवाद
‘मैं जन्म से वानर हूँ और रावण से मिलने के लिए ही मैंने उसके इस दुर्लभ वन को नष्ट किया है। इसके बाद आपके बलवान राक्षस युद्ध की इच्छा से मेरे पास आए और मैंने अपने शरीर की रक्षा के लिए युद्धभूमि में उनका सामना किया।॥14-15 1/2॥
 
‘I am a monkey by birth and I have destroyed this rare forest of the demon Ravana only to meet him. After this, your powerful demons came to me with the desire of fighting and I faced them on the battlefield to protect my body.॥ 14-15 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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