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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 51-52
 
 
श्लोक  5.48.51-52 
अस्त्रेण हनुमान् मुक्तो नात्मानमवबुध्यते।
कृष्यमाणस्तु रक्षोभिस्तैश्च बन्धैर्निपीडित:॥ ५१॥
हन्यमानस्तत: क्रूरै राक्षसै: कालमुष्टिभि:।
समीपं राक्षसेन्द्रस्य प्राकृष्यत स वानर:॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि हनुमान जी अस्त्र के बंधन से मुक्त हो गए थे, फिर भी उन्होंने ऐसा व्यवहार किया मानो उन्हें इसकी जानकारी ही न हो। क्रूर राक्षस उन्हें बंधनों से जकड़कर और ज़ोरदार घूँसों से मारते हुए घसीटते हुए ले गए। इस प्रकार, उस वीर वानर को राक्षसराज रावण के पास ले जाया गया।
 
Although Hanuman ji was freed from the bondage of the weapon, he behaved as if he did not know about it. The cruel demons dragged him away, tormenting him with the bonds and hitting him with hard punches. In this way, the brave monkey was taken to the demon king Ravana.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)