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ramayan 5.48.31: पवनपुत्र हनुमान्‌ बार-बार आकर उसके बाणों के सामने खड़े हो जाते और फिर हाथ फैलाकर क्षण भर में उड़ जाते ॥31॥   |   ramayan सर्ग 5.48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  5.48.31 
शराणामग्रतस्तस्य पुन: समभिवर्तत।
प्रसार्य हस्तौ हनुमानुत्पपातानिलात्मज:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
पवनपुत्र हनुमान्‌ बार-बार आकर उसके बाणों के सामने खड़े हो जाते और फिर हाथ फैलाकर क्षण भर में उड़ जाते ॥31॥
 
Time and again Hanuman, the son of the wind, would come and stand before his arrows, and then, spreading his hands, would fly away in no time. ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)