श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  5.48.28 
तत: शरानायततीक्ष्णशल्यान्
सुपत्रिण: काञ्चनचित्रपुङ्खान्।
मुमोच वीर: परवीरहन्ता
सुसंततान् वज्रसमानवेगान्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
इतने में ही शत्रु योद्धाओं का संहार करने वाला इन्द्रजित् बड़े-बड़े, तीखे अग्रभाग वाले, सुन्दर पंखों वाले, सुवर्ण के विचित्र पंखों से सुशोभित तथा वज्र के समान वेगवान बाणों का निरन्तर प्रहार करने लगा ॥28॥
 
Meanwhile, Indrajit, the slayer of enemy warriors, started continuously firing arrows with large and sharp tip and beautiful feathers, decorated with strange feathers of gold and swift like a thunderbolt. 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)