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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  5.48.22 
तस्मिंस्तत: संयति जातहर्षे
रणाय निर्गच्छति बाणपाणौ।
दिशश्च सर्वा: कलुषा बभूवु-
र्मृगाश्च रौद्रा बहुधा विनेदु:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
हृदय में हर्ष और उत्साह तथा हाथों में बाण लेकर जैसे ही वह युद्ध के लिए निकला, वैसे ही समस्त दिशाएँ अंधकारमय हो गईं और भयंकर पशु नाना प्रकार से चिंघाड़ने लगे।
 
As soon as he went out for the battle with joy and enthusiasm in his heart and arrows in his hands, all the directions became murky and fearsome animals began to cry out in various ways.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)