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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 42: राक्षसियों के मुख से एक वानर के द्वारा प्रमदावन के विध्वंस का समाचार सुनकर रावण का किंकर नामक राक्षसों को भेजना और हनुमान जी के द्वारा उन सबका संहार  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  5.42.40 
स तं परिघमादाय जघान रजनीचरान्।
सपन्नगमिवादाय स्फुरन्तं विनतासुत:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार विनता के पुत्र गरुड़ ने संघर्षरत सर्प को अपने पंजों में पकड़ लिया था, उसी प्रकार हनुमान ने भी हाथ में परिघ लेकर उन रात्रिचर जीवों का संहार करना आरम्भ कर दिया।
 
Just as Garuda, the son of Vinata, had held a struggling serpent in his claws, in the same way Hanuman, taking the Parigha in his hand, began killing those night creatures.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)