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ramayan 5.41.13: उस युद्ध में मेरी गति को कोई रोक नहीं सकता। मेरा पराक्रम कुंठित नहीं हो सकता। मैं अपार पराक्रम दिखाते हुए उन राक्षसों से युद्ध करूँगा और रावण द्वारा भेजी हुई समस्त सेना का संहार करके सुग्रीव के धाम किष्किन्धपुरी को सुखपूर्वक लौट जाऊँगा।॥13॥   |   ramayan सर्ग 5.41: हनुमान जी के द्वारा प्रमदावन (अशोक वाटिका)- का विध्वंस   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 41: हनुमान जी के द्वारा प्रमदावन (अशोक वाटिका)- का विध्वंस  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  5.41.13 
अहं च तै: संयति चण्डविक्रमै:
समेत्य रक्षोभिरभङ्गविक्रम:।
निहत्य तद् रावणचोदितं बलं
सुखं गमिष्यामि हरीश्वरालयम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
उस युद्ध में मेरी गति को कोई रोक नहीं सकता। मेरा पराक्रम कुंठित नहीं हो सकता। मैं अपार पराक्रम दिखाते हुए उन राक्षसों से युद्ध करूँगा और रावण द्वारा भेजी हुई समस्त सेना का संहार करके सुग्रीव के धाम किष्किन्धपुरी को सुखपूर्वक लौट जाऊँगा।॥13॥
 
My progress cannot be stopped in that war. My valour cannot be frustrated. I will fight those demons showing immense valour and after killing the entire army sent by Ravana, I will return happily to Kishkindapuri, the abode of Sugreeva.'॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)