श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 38: सीताजी का हनुमान जी को पहचान के रूप में चित्रकट पर्वत पर घटित हए एक कौए के प्रसंग को सुनाना, श्रीराम को शीघ्र बुलाने के लिये अनुरोध करना और चूड़ामणि देना  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  5.38.67 
प्रतिगृह्य ततो वीरो मणिरत्नमनुत्तमम्।
अङ्गुल्या योजयामास नह्यस्य प्राभवद् भुज:॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
उस परम मूल्यवान मणि को लेकर पराक्रमी हनुमानजी ने अपनी उँगली में धारण कर लिया। यद्यपि उनकी भुजा अत्यंत पतली थी, फिर भी वह उस छिद्र में समा न सकी (इससे ज्ञात होता है कि हनुमानजी ने अपना विशाल रूप दिखाकर पुनः सूक्ष्म रूप धारण कर लिया था)॥ 67॥
 
Taking that most precious gem, the valiant Hanuman put it on his finger. Even though his arm was extremely thin, it could not fit into the hole (this shows that after showing his gigantic form, Hanuman had again assumed a subtle form).॥ 67॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)