श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 38: सीताजी का हनुमान जी को पहचान के रूप में चित्रकट पर्वत पर घटित हए एक कौए के प्रसंग को सुनाना, श्रीराम को शीघ्र बुलाने के लिये अनुरोध करना और चूड़ामणि देना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  5.38.48 
त्वच्छोकविमुखो रामो देवि सत्येन ते शपे।
रामे दु:खाभिपन्ने तु लक्ष्मण: परितप्यते॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
'देवि! मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ कि श्री रामचन्द्रजी आपके वियोग के शोक से पीड़ित हैं और अन्य सब कार्यों से विमुख हो गए हैं - वे केवल आपका ही चिन्तन करते रहते हैं। जब श्री रामजी दुःखी होते हैं, तब लक्ष्मण भी सदैव व्याकुल रहते हैं॥ 48॥
 
‘Devi! I swear by the truth that Shri Ramchandraji is suffering from the grief of your separation and has turned away from all other activities – he keeps thinking only about you. Lakshmana is also always distressed when Shri Ram is sad.॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)