श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 38: सीताजी का हनुमान जी को पहचान के रूप में चित्रकट पर्वत पर घटित हए एक कौए के प्रसंग को सुनाना, श्रीराम को शीघ्र बुलाने के लिये अनुरोध करना और चूड़ामणि देना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  5.38.45 
यदि तौ पुरुषव्याघ्रौ वाय्विन्द्रसमतेजसौ।
सुराणामपि दुर्धर्षौ किमर्थं मामुपेक्षत:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
वे दोनों सिंह वायु और इन्द्र के समान तेजस्वी हैं। यदि वे देवताओं के लिए भी अजेय हैं, तो फिर वे मेरी उपेक्षा क्यों करते हैं?॥ 45॥
 
Those two lions are as illustrious as Vayu and Indra. If they are invincible even for the gods, then why do they ignore me?॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)