श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 38: सीताजी का हनुमान जी को पहचान के रूप में चित्रकट पर्वत पर घटित हए एक कौए के प्रसंग को सुनाना, श्रीराम को शीघ्र बुलाने के लिये अनुरोध करना और चूड़ामणि देना  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  5.38.4-5 
द्वितीयं कारणं यच्च ब्रवीषि विनयान्विते।
रामादन्यस्य नार्हामि संसर्गमिति जानकि॥ ४॥
एतत् ते देवि सदृशं पत्न्यास्तस्य महात्मन:।
का ह्यन्या त्वामृते देवि ब्रूयाद् वचनमीदृशम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'जनकनन्दिनी! आपने जो दूसरा कारण बताया है कि श्री रामचन्द्रजी के अतिरिक्त अन्य किसी पुरुष का मुझे स्वेच्छा से स्पर्श करना उचित नहीं है, वह आपके ही योग्य है। देवि! महात्मा श्री राम की पत्नी के मुख से ऐसी बात निकल सकती है। आपके अतिरिक्त और कौन स्त्री ऐसी बात कह सकती है?॥ 4-5॥
 
‘Janakanandini! The second reason you have given that it is not proper for me to touch any man other than Shri Ramchandraji willingly, is worthy of you only. Devi! Such a thing can come out of the mouth of the wife of Mahatma Shri Ram. Which other woman can say such a thing except you?॥ 4-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)