श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 37: सीता का हनुमान जी से श्रीराम को शीघ्र बुलाने का आग्रह, हनुमान जी का सीता से अपने साथ चलने का अनुरोध तथा सीता का अस्वीकार करना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  5.37.55 
मां वा हरेयुस्त्वद्धस्ताद् विशसेयुरथापि वा।
अनवस्थौ हि दृश्येते युद्धे जयपराजयौ॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
अथवा यह भी सम्भव है कि वे राक्षस मुझे तुम्हारे हाथ से छीन लें अथवा मार डालें; क्योंकि युद्ध में जय-पराजय तो सदैव अनिश्चित रहती है ॥55॥
 
‘Or it is also possible that those demons snatch me from your hands or kill me; because in war victory and defeat are always uncertain. ॥ 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)