श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 37: सीता का हनुमान जी से श्रीराम को शीघ्र बुलाने का आग्रह, हनुमान जी का सीता से अपने साथ चलने का अनुरोध तथा सीता का अस्वीकार करना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.37.33 
सीतायास्तु वच: श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मज:।
चिन्तयामास लक्ष्मीवान् नवं परिभवं कृतम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
सीता के ये शब्द सुनकर, पवनपुत्र हनुमान ने इसे अपने लिए एक नया अपमान समझा।
 
On hearing these words of Sita, the glorious son of the wind, Hanuman, took this as a fresh insult for himself.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)