श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 37: सीता का हनुमान जी से श्रीराम को शीघ्र बुलाने का आग्रह, हनुमान जी का सीता से अपने साथ चलने का अनुरोध तथा सीता का अस्वीकार करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.37.14 
आशंसेयं हरिश्रेष्ठ क्षिप्रं मां प्राप्स्यते पति:।
अन्तरात्मा हि मे शुद्धस्तस्मिंश्च बहवो गुणा:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे श्रेष्ठ वानर! मैं आशा करती हूँ कि मेरे पति शीघ्र ही आकर मुझसे मिलेंगे, क्योंकि मेरी आत्मा शुद्ध है और श्री रघुनाथजी में बहुत से अच्छे गुण हैं॥ 14॥
 
O great monkey! I am hoping that my husband will soon come and meet me because my soul is pure and Shri Raghunath has many good qualities.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)