नैव दंशान् न मशकान् न कीटान् न सरीसृपान्।
राघवोऽपनयेद् गात्रात् त्वद्गतेनान्तरात्मना॥ ४२॥
अनुवाद
श्री रघुनाथजी का मन सदैव आपमें ही लगा रहता है, इसलिए वे अपने शरीर पर बैठे मक्खियों, मच्छरों, कीड़ों और साँपों को हटाने की भी सुधि नहीं रखते॥42॥
The mind of Sri Raghunatha is always focused on you, so he does not even remember to remove the flies, mosquitoes, insects and snakes that are sitting on his body. ॥ 42॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥