श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 35: सीताजी के पूछने पर हनुमान जी का श्रीराम के शारीरिक चिह्नों और गुणों का वर्णन करना तथा नर-वानर की मित्रता का प्रसङ्ग सुनाकर सीताजी के मन में विश्वास उत्पन्न करना  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  5.35.84 
विश्वासार्थं तु वैदेहि भर्तुरुक्ता मया गुणा:।
अचिरात् त्वामितो देवि राघवो नयिता ध्रुवम्॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
‘विदेहनन्दनी! तुम्हें विश्वास दिलाने के लिए मैंने तुम्हारे स्वामी के गुणों का वर्णन किया है। देवि! श्री रघुनाथजी तुम्हें शीघ्र ही यहाँ से ले जाएँगे - यह निश्चित बात है।’॥ 84॥
 
‘Videhanandani! To convince you, I have described the qualities of your master. Devi! Sri Raghunathji will soon take you away from here – this is a certain thing.’॥ 84॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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