श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 35: सीताजी के पूछने पर हनुमान जी का श्रीराम के शारीरिक चिह्नों और गुणों का वर्णन करना तथा नर-वानर की मित्रता का प्रसङ्ग सुनाकर सीताजी के मन में विश्वास उत्पन्न करना  »  श्लोक 81-83
 
 
श्लोक  5.35.81-83 
माल्यवान् नाम वैदेहि गिरीणामुत्तमो गिरि:॥ ८१॥
ततो गच्छति गोकर्णं पर्वतं केसरी हरि:।
स च देवर्षिभिर्दिष्ट: पिता मम महाकपि:।
तीर्थे नदीपते: पुण्ये शम्बसादनमुद्धरन्॥ ८२॥
यस्याहं हरिण: क्षेत्रे जातो वातेन मैथिलि।
हनूमानिति विख्यातो लोके स्वेनैव कर्मणा॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
विदेहनन्दिनी! पर्वतों के बीच माल्यवान नामक एक महान पर्वत है। वहाँ केसरी नाम का एक वानर रहता था। एक दिन वह वहाँ से गोकर्ण पर्वत पर गया। महाकवि केसरी मेरे पिता हैं। उन्होंने समुद्रतट पर स्थित पवित्र गोकर्ण तीर्थ में ऋषियों की आज्ञा से शम्बसदन नामक राक्षस का वध किया था। मिथिलेशकुमारी! मैं उसी वानरराज केसरी की पत्नी के गर्भ से वायुदेव द्वारा उत्पन्न हुआ हूँ। मैं अपने ही कर्मों के कारण संसार में 'हनुमान' नाम से विख्यात हूँ।
 
Videhanandini! Among the mountains there is a great mountain known as Malyavan. A monkey named Kesari lived there. One day he went from there to Gokarna mountain. The great ape Kesari is my father. He had killed a demon named Shambasadan on the orders of the sages in the holy Gokarna Tirtha situated on the seashore. Mithileshkumari! I was born from the womb of the wife of the same monkey king Kesari by the god of wind. I am famous in the world by the name of 'Hanuman' due to my own deeds.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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