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श्लोक 5.35.79-80h  |
दिष्टॺा हि न मम व्यर्थं सागरस्येह लङ्घनम्॥ ७९॥
प्राप्स्याम्यहमिदं देवि त्वद्दर्शनकृतं यश:। |
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| अनुवाद |
| 'देवी! मेरा समुद्र पार करके यहाँ आना व्यर्थ नहीं गया। आपके दर्शन का सौभाग्य पाने वाला मैं प्रथम व्यक्ति हूँगा। यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है।' |
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| ‘Goddess! My crossing the ocean and coming here was not in vain. I will be the first one to get the honour of seeing you. This is a matter of good fortune for me. 79 1/2. |
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