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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 35: सीताजी के पूछने पर हनुमान जी का श्रीराम के शारीरिक चिह्नों और गुणों का वर्णन करना तथा नर-वानर की मित्रता का प्रसङ्ग सुनाकर सीताजी के मन में विश्वास उत्पन्न करना  »  श्लोक 72-73h
 
 
श्लोक  5.35.72-73h 
लङ्का चापि मया रात्रौ प्रविष्टा राक्षसाकुला॥ ७२॥
रावणश्च मया दृष्टस्त्वं च शोकनिपीडिता।
 
 
अनुवाद
मैं रात्रि के समय राक्षसों से भरी लंका में प्रवेश कर चुका हूँ। यहाँ आकर मैंने रावण को देखा है और तुम्हें भी शोक से पीड़ित देखा है।
 
I have entered Lanka, which is infested with demons, at night. Coming here, I have seen Ravana and have also seen you, stricken with grief. 72 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)