श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 35: सीताजी के पूछने पर हनुमान जी का श्रीराम के शारीरिक चिह्नों और गुणों का वर्णन करना तथा नर-वानर की मित्रता का प्रसङ्ग सुनाकर सीताजी के मन में विश्वास उत्पन्न करना  »  श्लोक 63-64
 
 
श्लोक  5.35.63-64 
तेषां न: स्वामिसंदेशान्निराशानां मुमूर्षताम्॥ ६३॥
कार्यहेतोरिहायात: शकुनिर्वीर्यवान् महान्।
गृध्रराजस्य सोदर्य: सम्पातिर्नाम गृध्रराट्॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
'अपने स्वामी की आज्ञा पालन से निराश होकर हम लोग मरने ही वाले थे कि संयोगवश गिद्धराज जटायु के बड़े भाई सम्पाती, जो स्वयं गिद्धराज और अत्यंत शक्तिशाली पक्षी हैं, हमारा कार्य पूर्ण करने के लिए वहां आ पहुंचे।
 
‘Disappointed with obeying our master, we were about to die when, by chance, Sampati, the elder brother of vulture king Jatayu, who is himself the king of vultures and a very powerful bird, arrived there to accomplish our task.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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