श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 35: सीताजी के पूछने पर हनुमान जी का श्रीराम के शारीरिक चिह्नों और गुणों का वर्णन करना तथा नर-वानर की मित्रता का प्रसङ्ग सुनाकर सीताजी के मन में विश्वास उत्पन्न करना  »  श्लोक 61-62h
 
 
श्लोक  5.35.61-62h 
ततस्तस्य गिरेर्मूर्ध्नि वयं प्रायमुपास्महे।
दृष्ट्वा प्रायोपविष्टांश्च सर्वान् वानरपुङ्गवान्॥ ६१॥
भृशं शोकार्णवे मग्न: पर्यदेवयदङ्गद:।
 
 
अनुवाद
‘हम सब लोग आमरण व्रत का निश्चय करके उस पर्वत की चोटी पर बैठ गये। उस समय समस्त वानर सरदारों को प्राण त्यागने के लिए बैठे देखकर कुमार अंगद अत्यंत शोक के समुद्र में डूब गये और विलाप करने लगे।’
 
‘Having resolved to fast till death, all of us sat down on the top of that mountain. At that time, seeing all the monkey chiefs sitting down to give up their lives, Kumar Angad was drowned in a sea of ​​extreme grief and started wailing. 61 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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