श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 35: सीताजी के पूछने पर हनुमान जी का श्रीराम के शारीरिक चिह्नों और गुणों का वर्णन करना तथा नर-वानर की मित्रता का प्रसङ्ग सुनाकर सीताजी के मन में विश्वास उत्पन्न करना  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  5.35.60 
विचित्य गिरिदुर्गाणि नदीप्रस्रवणानि च।
अनासाद्य पदं देव्या: प्राणांस्त्यक्तुं व्यवस्थिता:॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
‘हमने पर्वतों के दुर्गम स्थानों, नदियों के तटों और झरनों के आस-पास की भूमि पर खोज की, किन्तु जब देवी सीता (आप) का पता न लगा, तब हम प्राण त्यागने को तैयार हो गए॥60॥
 
‘We searched all the remote places of the mountains, the banks of the rivers and the lands around the waterfalls, but when we could not find the location of Goddess Sita (you), we became ready to give up our lives.॥ 60॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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