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श्लोक 5.35.32-33h  |
निवेदितौ च तत्त्वेन सुग्रीवाय महात्मने॥ ३२॥
तयोरन्योन्यसम्भाषाद् भृशं प्रीतिरजायत। |
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| अनुवाद |
| वहाँ मैंने महात्मा सुग्रीव को इन दोनों भाइयों का सच्चा परिचय दिया। उसके बाद श्री राम और सुग्रीव ने आपस में बातचीत की, जिससे उनमें बड़ा प्रेम हो गया। |
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| There I gave the true introduction of these two brothers to Mahatma Sugriva. After that Shri Ram and Sugriva talked to each other, due to which there was great love between them. |
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